
जीएसटी में बड़े बदलाव की आहट: राज्यों की चिंता, जनता को राहत?
राज्यों के वित्त मंत्रियों की अहम बैठक: क्या घटेगी कमाई?-
हाल ही में, जीएसटी काउंसिल की 56वीं बैठक से ठीक पहले, आठ विपक्षी राज्यों के वित्त मंत्रियों ने एक महत्वपूर्ण बैठक की। इन राज्यों में हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, केरल, पंजाब, तमिलनाडु, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल शामिल थे। इन सभी राज्यों को एक बात की चिंता सता रही है – जीएसटी की नई दरों के लागू होने से उनकी कमाई पर क्या असर पड़ेगा? उनका मानना है कि मौजूदा 12% और 28% टैक्स स्लैब में बदलाव से राजस्व में कमी आ सकती है। झारखंड के वित्त मंत्री ने तो यहाँ तक कह दिया कि अगर केंद्र सरकार से मुआवजा नहीं मिला, तो उनके राज्य को अकेले 2000 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है। इसलिए, ये राज्य तभी इस प्रस्ताव पर सहमत होंगे जब केंद्र सरकार उन्हें नुकसान की भरपाई का पक्का भरोसा दिलाएगी।
केंद्र सरकार का तर्क: सस्ता सामान, बढ़ी हुई खपत और अर्थव्यवस्था को बूस्ट-जहां एक तरफ राज्य सरकारें अपनी कमाई घटने की बात कर रही हैं, वहीं केंद्र सरकार का नज़रिया थोड़ा अलग है। उनका कहना है कि टैक्स स्लैब कम होने से आम जनता को बड़ी राहत मिलेगी। जब खाने-पीने की चीज़ें, कपड़े और दवाइयां जैसी रोज़मर्रा की ज़रूरत की चीज़ें सस्ती होंगी, तो लोग ज़्यादा खरीदेंगे। इससे न केवल उनकी जेब पर बोझ कम होगा, बल्कि अर्थव्यवस्था में भी तेज़ी आएगी और टैक्स कलेक्शन भी धीरे-धीरे अपने आप बढ़ेगा। वित्त मंत्रालय का मानना है कि भले ही टैक्स दरें कम हों, लेकिन लंबे समय में इससे कोई खास नुकसान नहीं होगा। साथ ही, यह कदम जीएसटी को और भी सरल बना देगा, जिससे लोगों के लिए टैक्स नियमों का पालन करना आसान हो जाएगा।
नया प्रस्ताव: सिर्फ दो टैक्स स्लैब और एक खास दर का सुझाव-इस बार जीएसटी काउंसिल में केंद्र सरकार एक ‘नेक्स्ट-जनरेशन’ प्रस्ताव लेकर आई है। इसमें मौजूदा 12% और 28% वाले टैक्स स्लैब को हटाकर सिर्फ दो मुख्य दरें रखने का विचार है: 5% और 18%। इसके अलावा, कुछ खास लग्जरी और नुकसानदायक मानी जाने वाली चीज़ों पर 40% की एक विशेष दर लगाने का सुझाव दिया गया है। इस बदलाव का असर कई उत्पादों पर पड़ सकता है। उदाहरण के लिए, रोज़मर्रा में इस्तेमाल होने वाली चीज़ें जैसे घी, नमकीन, कपड़े, चप्पल, दवाइयां और पानी जैसी चीज़ों पर टैक्स घटकर सिर्फ 5% रह सकता है। वहीं, टीवी, फ्रिज और वॉशिंग मशीन जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण 28% से घटकर 18% स्लैब में आ सकते हैं, जिससे वे पहले से सस्ते हो जाएंगे। हालांकि, एसयूवी और लग्जरी कारों जैसी गाड़ियों पर 40% टैक्स का बोझ बढ़ सकता है।
ऑटोमोबाइल और लग्जरी सामान पर पड़ सकता है ज़्यादा असर-नई टैक्स व्यवस्था में, आम लोगों के लिए कार खरीदना शायद सस्ता हो जाए, लेकिन एसयूवी और लग्जरी कारों की कीमतें और बढ़ सकती हैं। फिलहाल, गाड़ियों पर 28% जीएसटी के साथ-साथ कम्पनसेशन सेस भी लगता है। नए प्रस्ताव के अनुसार, छोटी और एंट्री-लेवल की गाड़ियों को 18% टैक्स स्लैब में रखा जाएगा। लेकिन, एसयूवी और महंगी गाड़ियों पर 40% का विशेष टैक्स लगाया जाएगा। यही टैक्स तंबाकू, पान मसाला और सिगरेट जैसी चीज़ों पर भी लागू होगा। इस बात पर भी विचार किया जा रहा है कि अगर इस विशेष टैक्स से ज़्यादा राजस्व आता है, तो उसका एक हिस्सा सीधे राज्यों के साथ बांटा जाए ताकि उनके नुकसान की भरपाई हो सके।
कम्पनसेशन सेस का मसला: राज्यों की सबसे बड़ी मांग-जब जीएसटी लागू किया गया था, तब केंद्र और राज्यों के बीच यह समझौता हुआ था कि शुरुआती 5 सालों तक राज्यों को होने वाले राजस्व के नुकसान की भरपाई की जाएगी। इसके लिए लग्जरी और नुकसानदायक चीज़ों पर कम्पनसेशन सेस लगाया गया था। यह व्यवस्था जून 2022 तक चलनी थी, लेकिन कोविड महामारी के कारण हुए नुकसान की भरपाई के लिए केंद्र ने कर्ज लिया और इस सेस को 2026 तक बढ़ा दिया। अब जब यह कर्ज अक्टूबर-नवंबर तक चुका दिया जाएगा, तो कम्पनसेशन सेस खत्म हो जाएगा। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जीएसटी की नई दरों से राज्यों को होने वाले नुकसान की भरपाई कैसे होगी।
राज्यों की सीधी मांग: नुकसान की भरपाई का पक्का वादा चाहिए-पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों ने अपनी मांगें स्पष्ट कर दी हैं। उनका कहना है कि 40% के विशेष टैक्स से जो भी अतिरिक्त कमाई होगी, उसका हिस्सा सीधे राज्यों को मिलना चाहिए। राज्यों का तर्क है कि जब केंद्र ने जीएसटी लागू किया था, तब उन्होंने अपने कई टैक्स, जैसे वैट और एक्साइज, छोड़ दिए थे। अब अगर नई व्यवस्था से उनकी कमाई कम होती है, तो इसकी ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार की ही बनती है। यह सिर्फ पैसों का मामला नहीं है, बल्कि यह हमारे संघीय ढांचे का भी सवाल है, इसलिए केंद्र को इस पर ध्यान देना चाहिए।
अब सबकी निगाहें 56वीं जीएसटी काउंसिल की बैठक पर टिकी हैं-सबकी उम्मीदें अब 56वीं जीएसटी काउंसिल की बैठक पर टिकी हैं, जिसकी अध्यक्षता खुद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण करेंगी। अगले दो दिनों में इस बैठक में नए टैक्स ढांचे पर विस्तार से चर्चा होगी। यह बैठक इसलिए भी अहम है क्योंकि इसी में यह तय होगा कि आम जनता को रोज़मर्रा की चीज़ों पर कितनी राहत मिलेगी और राज्यों को होने वाले नुकसान की भरपाई कैसे की जाएगी। अगर सब कुछ ठीक रहा और सहमति बन गई, तो जीएसटी की पूरी व्यवस्था और भी सरल हो जाएगी। लेकिन, अगर राज्यों और केंद्र के बीच कोई असहमति बनी, तो इसका सीधा असर आम जनता की जेब पर भी पड़ सकता है।



