दिल्ली

खौफनाक आंकड़े: भारत में हर साल 1 लाख किडनैपिंग, 10 साल में 10 लाख पार हुआ अपहरण का ग्राफ

नेशनल डेस्क। दिल्ली के मशहूर सिविल सेवा कोचिंग सेंटर की निदेशक शुभ्रा रंजन के साथ भोपाल में हुई सनसनीखेज वारदात ने देश को हिला कर रख दिया है। 3 मई को बंदूक की नोक पर उनका अपहरण किया गया और 1.89 करोड़ रुपये की भारी-भरकम फिरौती वसूलने के बाद उन्हें छोड़ा गया। इस घटना ने एक बार फिर भारत में अपराध की बढ़ती गंभीरता और सुरक्षा व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

जानें क्या है शुभ्रा रंजन मामला?

भोपाल में हुई इस घटना में अपराधियों ने फिल्मी अंदाज में निदेशक शुभ्रा रंजन को अगवा किया। पीड़ित को तब तक बंधक बनाकर रखा गया जब तक कि करोड़ों रुपये की रकम नहीं मिल गई। हालांकि पुलिस इस मामले में सक्रिय है लेकिन यह घटना महज एक बानगी है। भारत में अपहरण के मामलों का ग्राफ जिस तेजी से ऊपर जा रहा है, वह बेहद चिंताजनक है।

आंकड़ों की जुबानी: 10 साल में 10 लाख केस

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो और अन्य सांख्यिकीय डेटा के अनुसार पिछले एक दशक में किडनैपिंग की वारदातों में जबरदस्त उछाल आया है:

दशक का रिकॉर्ड: अकेले पिछले 10 वर्षों (2013-2024) में देश में 10 लाख से अधिक अपहरण के मामले सामने आए हैं।

इतिहास का सबसे बुरा दौर: भारत में 1953 से 2024 के बीच कुल 20 लाख मामले दर्ज हुए, जिनमें से 54 प्रतिशत मामले केवल पिछले 11 सालों में हुए हैं।

हिस्सेदारी: कुल आपराधिक मामलों (IPC/BNS) में अपहरण की हिस्सेदारी करीब 1.7% है, और यह ग्राफ 1973 के बाद से लगातार बढ़ रहा है।

फिरौती नहीं, ये हैं अपहरण की असली वजहें

हैरानी की बात यह है कि शुभ्रा रंजन जैसे फिरौती वाले मामले कुल अपराध का महज 0.7% ही हैं। आंकड़ों के मुताबिक अपहरण के पीछे के मुख्य कारण कुछ और हैं:

जबरन उठाना (Abduction): कुल मामलों में आधे से ज्यादा केस लोगों को जबरन उठाने या गायब करने के हैं।

शादी के लिए अपहरण: फिरौती के बाद सबसे बड़ा कारण महिलाओं का विवाह के उद्देश्य से अपहरण करना पाया गया है।

पारिवारिक या व्यक्तिगत विवाद: कई मामलों में आपसी रंजिश के चलते भी अगवा करने की घटनाएं होती हैं।

राज्यों का हाल: बिहार अब तीसरे नंबर पर नहीं

अपहरण के मामलों में राज्यों की रैंकिंग में भी बदलाव देखने को मिला है। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र ये राज्य अभी भी सूची में ऊपरी पायदान पर बने हुए हैं। लंबे समय तक तीसरे नंबर पर रहने वाला बिहार 2024 के आंकड़ों के अनुसार शीर्ष छह राज्यों की सूची में सबसे नीचे (छठे स्थान पर) पहुंच गया है जो राज्य की कानून व्यवस्था में सुधार का संकेत देता है।

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