दिल्ली

रंगमंच ‘विकसित भारत’ की मानसिकता गढ़ने की सबसे जीवंत कला: चित्तरंजन त्रिपाठी

नई दिल्ली। ​राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी ने रविवार को कहा कि रंगमंच ‘विकसित भारत’ की मानसिकता गढ़ने की सबसे जीवंत कला है।

निदेशक चित्तरंजन ने यह बात आज दिल्ली स्थित एनएसडी परिसर में चल रहे ‘भारत रंग महोत्सव 2026’ के तहत एक कार्यक्रम में कही।

इस अवसर पर आयोजित संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने रंगमंच को संस्कृतियों के बीच का सेतु बताया। ​आज संस्कृतियों के बीच संवाद: रंगमंच के संदर्भ में विषय पर आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी से हुई।

उन्होंने कहा, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘विकसित भारत’ के सपने को साकार करने के लिए ‘विकसित सोच’ का होना आवश्यक है और रंगमंच इस मानसिकता को गढ़ने का सबसे सशक्त माध्यम है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान का अर्थ प्रभुत्व जमाना नहीं, बल्कि आपसी सम्मान और समझ बढ़ाना है।

एनएसडी सोसाइटी के उपाध्यक्ष ​प्रो. भरत गुप्त ने कहा कि रंगमंच का सबसे बड़ा उपहार मानवीय भावनाओं का आनंद और सामाजिक कल्याण है।

आईएचसी के निदेशक ​प्रो. के. जी. सुरेश ने रंगमंच को आज के दौर में भी संचार का सबसे प्रभावी माध्यम बताया।

​एनएसडी के डीन (अकादमिक) शांतनु बोस ने चर्चा का सारांश प्रस्तुत करते हुए कहा कि रंगमंच भौगोलिक सीमाओं के साथ-साथ उम्र और वर्ग की बाधाओं को भी तोड़ता है।

​ अभिनेत्री भूमि पेडनेकर ने एनएसडी निदेशक के साथ संवाद के दौरान अपने करियर के शुरुआती संघर्षों को साझा किया।

​बीआरएम के इस दिन देश-विदेश की विविध नाट्य शैलियों का संगम देखने को मिला।

महेश मांजरेकर द्वारा निर्देशित ‘लवएबल रास्कल’ और रामधारी सिंह दिनकर की कालजयी रचना ‘रश्मिरथी’ के एकल मंचन ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके अलावा, छत्तीसगढ़ी लोक नाट्य ‘नाचा’ ने क्षेत्रीय संस्कृति की महक बिखेरी।

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