रिटायर्ड कर्मचारियों को बड़ी राहत, CAT ने अलाउंस देने के जारी किए आदेश

चंडीगढ़ : सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) के चंडीगढ़ बेंच ने PGI चंडीगढ़ के कई रिटायर्ड कर्मचारियों को बड़ी राहत देते हुए संस्था को 20 अप्रैल 1998 से 30 जून 2017 तक अस्पताल मरीज देखभाल भत्ता (HPCA) जारी करने के निर्देश दिए है। ट्रिब्यूनल ने साफ किया कि यह भुगतान आदेश की कॉपी मिलने के तीन महीने के अंदर किया जाए। फैसले के बाद प्रभावित कर्मचारियों को उनकी सर्विस पीरियड के हिसाब से 2 से 3 लाख रुपये तक का बकाया मिलने की संभावना बन आई है। दरअसल PGI द्वारा ग्रुप सी से ग्रुप बी में तरक्की मिलने के बाद इन कर्मचारियों का HPCA भत्ता बंद कर दिया गया था, जिसे चुनौती देते हुए उन्होंने ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया था।
तकक्की के बावजूद नहीं बदला ड्यूटी और काम का वातावरण
वकील करण सिंगला और निधि सिंगला के जरिए दायर की गई एप्लीकेशन में PGI से रिटायर्ड दर्शन सिंह और दूसरे कर्मचारियों ने 13 जुलाई, 2022 के ऑर्डर को रद्द करने की मांग की, जिसके तहत संस्था ने उनके भत्ते के दावे को खारिज कर दिया था। एप्लीकेंट्स ने ट्रिब्यूनल के सामने दलील दी कि उन्हें जूनियर टेक्नीशियन (एनेस्थीसिया) ग्रुप C के तौर पर भर्ती किया गया था और बाद में सीनियर थिएटर मास्टर-सीनियर टेक्नीशियन (एनेस्थीसिया) ग्रुप B में प्रमोट कर दिया गया। प्रमोशन के बावजूद, उनकी ड्यूटी और काम का माहौल बदले बिना, PGI ने HPCA अलाउंस रोक दिया, जो गलत है।
तीन महीने के अंदर पूरा भुगतान करने के आदेश
कर्मचारियों ने कहा कि उन्हें यह अलाउंस अस्पताल के दूषित और संवेदनशील वातावरण में काम करने के जोखिम की वजह से मिलता था, जो प्रमोशन के बाद भी जारी रहना चाहिए था। उन्होंने 10 जुलाई 2013 के CAT के फैसले का जिक्र किया, जिसे 11 जनवरी 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा था। ट्रिब्यूनल ने दलीलों से सहमत होकर PGI के अलाउंस देने से मना करने के ऑर्डर को रद्द कर दिया और इंस्टीट्यूशन और हेल्थ मिनिस्ट्री को सरकारी ऑर्डर के मुताबिक 20 अप्रैल 1998 से HPCA/PCA अलाउंस जारी करने और तीन महीने के अंदर पूरा पेमेंट करने का निर्देश दिया। गौरतलब है कि 1985 की बैकलॉग प्रमोशन स्कीम के तहत आठ साल से एक ही पोस्ट पर काम कर रहे कर्मचारियों को प्रमोट किया जाता है, लेकिन ट्रिब्यूनल ने साफ कर दिया है कि प्रमोशन के नाम पर उन्हें सर्विस अलाउंस से वंचित करना कानूनी तौर पर सही नहीं है।




