छत्तीसगढ़

चर्चा संकट की नहीं, बल्कि उसके समाधान की होनी चाहिए -डॉ. मोहन भागवत

लोगों को जाति, धन या भाषा के आधार पर नहीं आंका जाना चाहिए

संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर उत्सव मनाने के बजाय समाज के बीच जाकर कार्य करने का निर्णय लिया गया

हिंदू सम्मेलन आयोजन का उद्देश्य सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्र निर्माण का संदेश देना है

रायपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत रायपुर जिले के अभनपुर क्षेत्र में आयोजित हिंदू सम्मेलन में शामिल हुए। यह सम्मेलन अभनपुर के सोनपैरी गांव स्थित असंग देव कबीर आश्रम में आयोजित किया गया जहां डॉ. मोहन भागवत ने मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित किया। सम्मेलन का शुभारंभ मंच पर राष्ट्रीय संत असंग देव, गायत्री परिवार की प्रमुख उर्मिला नेताम सहित अन्य अतिथियों की उपस्थिति में हुआ। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा, केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू, कैबिनेट मंत्री ओपी चौधरी, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंहदेव, सांसद बृजमोहन अग्रवाल सहित भाजपा, आरएसएस और विभिन्न हिंदू संगठनों के प्रमुख नेता एवं पदाधिकारी भी शामिल हुए।  हिंदू सम्मेलन को संबोधित करते हुए सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने आरएसएस के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर उत्सव मनाने के बजाय समाज के बीच जाकर कार्य करने का निर्णय लिया गया है। उन्होंने कहा कि चर्चा संकट की नहीं, बल्कि उसके समाधान की होनी चाहिए। डॉ. भागवत ने जीवन में पांच बातों का विशेष ध्यान रखने की बात कही। उन्होंने कहा कि सभी को अपना मानें, अपनों के साथ अधिक से अधिक समय बिताएं, देश और समाज के लिए समय व धन दें, अपनी भाषा का अधिक प्रयोग करें, स्वावलंबी बनें और संविधान का पालन करें। उन्होंने बताया कि आरएसएस की स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में हिंदू सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्र निर्माण का संदेश देना है। …

समाचार एजेंसी भाषा के अनुसार .. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डा.मोहन भागवत ने बुधवार को कहा कि लोगों को जाति, धन या भाषा के आधार पर नहीं आंका जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यह देश सभी का है।भागवत ने सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण की ज़िम्मेदारी और अनुशासित नागरिक जीवन का आह्वान किया तथा लोगों से मतभेदों से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के लिए मिलकर काम करने का आग्रह किया।छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले के सोनपैरी गांव में ‘हिंदू सम्मेलन’ को संबोधित करते हुए, भागवत ने कहा कि सामाजिक सद्भाव की दिशा में पहला कदम अलगाव और भेदभाव की भावनाओं को दूर करना है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि मंदिर, जल निकाय और श्मशान घाट, चाहे किसी ने भी स्थापित किए हों, सभी हिंदुओं के लिए खुले होने चाहिए। उन्होंने सामाजिक कार्य को एकता का प्रयास बताया, न कि संघर्ष का।उन्होंने कहा, ‘..लोगों को जाति, धन, भाषा या क्षेत्र के आधार पर मत आंकिए। सभी को अपना समझें। पूरा भारत मेरा है।’ उन्होंने इस दृष्टिकोण को सामाजिक समरसता बताया। भागवत ने कहा कि सार्वजनिक सुविधाएं और धार्मिक स्थान सभी के लिए खुले होने चाहिए।उन्होंने कहा कि इसके लिए संघर्ष की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह जोडऩे का काम है।नशे की समस्या पर, भागवत ने कहा कि अकेलापन अक्सर लोगों को नशे की ओर धकेल देता है।सरसंघचालक ने सप्ताह में एक दिन साथ बिताकर, प्रार्थना कर, घर का बना खाना साझा करके और तीन से चार घंटे तक बातचीत कर पारिवारिक मेलजोल को फिर से शुरू करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। उन्होंने इसे ‘मंगल संवाद’ बताया। भागवत ने कुटुंब प्रबोधन की अवधारणा पर ज़ोर दिया और कहा कि व्यक्तियों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि वे रोज़ाना समाज और राष्ट्र के लिए कितना समय और संसाधन समर्पित करते हैं।उन्होंने कहा, ‘अगर देश खतरे में है, तो परिवार भी खतरे में है।’भागवत ने इस दौरान दैनिक जीवन में मूल्यों का पालन करने का आह्वान किया।ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण के क्षरण पर चिंता व्यक्त करते हुए, भागवत ने लोगों से पानी बचाकर, वर्षा जल संचयन अपनाकर, एकल उपयोग प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करके और अधिक पेड़ लगाकर अपने घरों से ही संरक्षण के प्रयास शुरू करने का आग्रह किया।उन्होंने घर पर अपनी मातृभाषा के उपयोग, भारतीय पहनावे के प्रति सम्मान और स्थानीय रूप से बने उत्पादों को खरीदकर स्वदेशी और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने की भी वकालत की।उन्होंने यह भी कहा कि उन मामलों में जहां दवाइयों जैसी विदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल अपरिहार्य है तब उन्हें खरीदना चाहिए।भागवत ने संविधान, कानूनों और नागरिक अनुशासन का सख्ती से पालन करने का आह्वान किया।उन्होंने कहा कि संविधान की प्रस्तावना, नागरिक कर्तव्य, मार्गदर्शक तत्व और नागरिक अधिकार को बार-बार पढऩा चाहिए क्योंकि धर्म का आचरण कैसा हो, उसका चित्र उसमें दिखता है।इसके साथ ही उन्होंने कहा कि लोगों को बड़ों का सम्मान करने और जरूरतमंदों की सहायता करने जैसे पारंपरिक सामाजिक और नैतिक मूल्यों का पालन करना चाहिए।

विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल गायत्री परिवार की प्रमुख उर्मिला नेताम ने कहा कि वर्तमान समय में बच्चों को अच्छे संस्कार नहीं मिल पा रहे हैं, जबकि इसकी अत्यंत आवश्यकता है। उन्होंने नशे की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताई और गीत के माध्यम से संदेश दिया कि यदि नारी जाग जाए तो देश बदल सकता है। राष्ट्रीय संत असंग देव ने अपने संबोधन में कहा कि स्वयंसेवक संघ स्वयं की सेवा करना सिखाता है। उन्होंने कहा कि संगठित रहना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि संस्कारों के अभाव में मनुष्य श्रेष्ठ जीवन मिलने के बावजूद भी हैवानियत की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने संगत और अनुशासन को जीवन, परिवार और राष्ट्र के लिए अनिवार्य बताया और कहा कि आपस में बंटकर नहीं, बल्कि सटकर रहना चाहिए।

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