
एथनॉल उत्पादन की राह खुली: अब मिलें खुलकर बनाएंगी ईंधन!-खुशखबरी! अब शुगर मिलों और डिस्टिलरी के लिए एथनॉल बनाने के रास्ते से सारी रुकावटें हटा दी गई हैं।** केंद्र सरकार ने एक बड़ा और अहम फैसला सुनाया है, जिससे नवंबर 2025 से शुरू होने वाले मार्केटिंग ईयर (2025-26) से ये कंपनियां पूरी तरह आज़ाद होंगी। पहले जहां गन्ने के रस, शुगर सिरप, बी-हैवी और सी-हैवी शीरे (molasses) से एथनॉल बनाने पर कई तरह की बंदिशें थीं, वहीं अब इन सभी चीजों का इस्तेमाल करके कंपनियां बेझिझक एथनॉल का उत्पादन कर सकेंगी। सरकार का यह कदम देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और पेट्रोल पर हमारी निर्भरता को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस फैसले से उम्मीद है कि एथनॉल उत्पादन में ज़बरदस्त बढ़ोतरी होगी, जो हमारी बढ़ती ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने में मददगार साबित होगा। हालांकि, घरेलू बाज़ार में चीनी की उपलब्धता पर कोई असर न पड़े, इसके लिए पेट्रोलियम मंत्रालय लगातार हालात की समीक्षा करता रहेगा और ज़रूरत के हिसाब से कदम उठाएगा। यह संतुलन बनाना बहुत ज़रूरी है ताकि किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को फायदा हो।
चीनी से एथनॉल: एक नई शुरुआत और उसका असर-सोचिए, अभी 2024-25 के लिए ही सरकार ने करीब 40 लाख टन चीनी को सीधे एथनॉल उत्पादन में इस्तेमाल करने की इजाज़त दी है। यह कोई छोटी बात नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि हम ईंधन के लिए आत्मनिर्भर बनने की ओर कितनी तेज़ी से बढ़ रहे हैं। जब इतनी बड़ी मात्रा में चीनी ईंधन बनाने में इस्तेमाल होगी, तो ज़ाहिर है पेट्रोल पर हमारी निर्भरता कम होगी। लेकिन इसका फायदा सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। गन्ने की खपत बढ़ने से हमारे अन्नदाता किसानों की आय में भी सीधा इज़ाफा होगा। पहले जहां शुगर मिलों को एथनॉल बनाने के लिए तय सीमा में बंधना पड़ता था, अब उस बंधन को तोड़ दिया गया है। इस फैसले का असर दोहरी मार की तरह होगा: एक तरफ चीनी उद्योग को एक स्थिर बाज़ार मिलेगा, जिससे उन्हें आर्थिक मजबूती मिलेगी, और दूसरी तरफ, हम अपने पेट्रोल में एथनॉल मिलाने (blending) के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को आसानी से हासिल कर पाएंगे। यह किसानों और उद्योगों दोनों के लिए एक जीत की स्थिति है।
एथनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल: भारत का बड़ा लक्ष्य-केंद्र सरकार काफी समय से ‘एथनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल’ (EBP) प्रोग्राम को ज़ोर-शोर से चला रही है। इस प्रोग्राम के तहत पेट्रोल में एक निश्चित मात्रा में एथनॉल मिलाकर बेचा जाता है। देश की सरकारी तेल कंपनियां इस काम को बखूबी अंजाम दे रही हैं। अगर हम मौजूदा आंकड़ों पर नज़र डालें, तो जुलाई 2025 तक पेट्रोल में औसतन 19.05% एथनॉल मिलाया जा चुका है। यह आंकड़ा अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है और यह दर्शाता है कि भारत अब पेट्रोल में 20% एथनॉल मिलाने के अपने लक्ष्य के बहुत करीब पहुँच चुका है। आपको बता दें कि पहले यह लक्ष्य 2030 तक हासिल करने की योजना थी, लेकिन सरकार ने इस योजना को और तेज़ कर दिया। 2018 की ‘नेशनल पॉलिसी ऑन बायोफ्यूल्स’ में 2022 में संशोधन किया गया और अब लक्ष्य है कि 2025-26 तक हम 20% एथनॉल ब्लेंडिंग का आंकड़ा पार कर लें। यह एक महत्वाकांक्षी रोडमैप है जिसे सरकार पूरी गंभीरता से लागू कर रही है।
किसानों और उद्योग के लिए सुनहरे दिन!-इस पूरे मामले का सबसे सीधा और सबसे बड़ा फायदा हमारे मेहनती गन्ना किसानों को मिलने वाला है। जब एथनॉल की मांग बढ़ेगी, तो ज़ाहिर सी बात है कि गन्ने की कीमत में भी उछाल आएगा और गन्ने की खपत भी बढ़ेगी। इससे किसानों की जेब में सीधा पैसा आएगा और उनकी आर्थिक स्थिति मज़बूत होगी। वहीं, शुगर मिलों के लिए भी यह एक बड़ी राहत है। चीनी बेचकर जो अनिश्चितता बनी रहती थी, उसकी जगह अब एथनॉल उत्पादन में उन्हें एक स्थिर बाज़ार मिल गया है। उद्योग जगत के जानकारों का भी यही मानना है कि एथनॉल पर सरकार का यह बढ़ता ध्यान भारत को आयातित तेल पर निर्भरता से बाहर निकालने में अहम भूमिका निभाएगा और देश में पेट्रोलियम की खपत को भी नियंत्रित करेगा। कुल मिलाकर, यह पूरी योजना किसानों, उद्योगों और हमारे पर्यावरण, तीनों के लिए एक ‘विन-विन’ सिचुएशन साबित होने वाली है।



